बोलना ही है।

अपनी किताब ‘बोलना ही है’ में लेखक रवीश कुमार ने पत्रकारिता, राष्ट्र, लोकतंत्र, जनता होने के अधिकार के साथ साथ और भी कई विषयो पर बड़े ही व्यंग्यात्मक तरीके से टिप्पणी की है। देश की सामाजिक मानसिकता में एक बहुत बड़ा बदलाव आया है, जिससे हम अनजान नहीं हैं। इस बदलाव से हुए बीते वर्षों में कुछ छोटी और कुछ बड़ी घटनाओं की आलोचना करते हुए लेखक ने परिस्थिति की गंभीरता को भी उजागर किया है।

एक पत्रकार होने के नाते उन्होंने मुख्यधारा पत्रकारिता में आए नैतिक पतन पर अपना दुख व्यक्त तो किया ही है, साथ ही साथ उसके विकल्प में आए नागरिक पत्रकारिता को लेके आशापूर्ण हैं और इसका महत्व भी समझाया है। उनके विचारों को पढ़कर पता चलता है कि उन्होंने समाज के हर एक पहलू को बड़ी बारीकी से अध्ययन किया है और समझा है, जिसे किताब की इस छोटी सी समीक्षा में बता पाना कठिन है।

उनके व्यक्तिगत जीवन और बचपन की छोटी छोटी घटनाओं को पढ़कर अच्छा लगा।

लेखक ने भाषा को सरल रखा है ताकि हर कोई पढ़ सके। किताब अंग्रेज़ी में भी उपलब्ध है, जिसका शीर्षक है ‘The Free Voice’। लेकिन इसे हिंदी में पढ़ने का मेरा एकमात्र कारण यही है कि रवीश जी अपनी पत्रकारिता मूल रूप से हिन्दी में ही करते हैं। उनके मुंह से समाचार सुनना लोगों को पसंद है। इस लेख को मन ही मन उन्हिके आवाज़ में पढ़ना किताब पढ़ने के अनुभव को उन्हें वास्तव में सुनने जैसा बना देता है। किताब को अंग्रेज़ी में पढ़कर यह अनुभव कर पाना शायद मुश्किल ही होगा।

यह किताब हर उस नागरिक को पढ़ना चाहिए जो देश के भविष्य के बारे में चिंतन करता है। रवीश जी के इस लेख का एक ही संदेश है, कि अब वक़्त चुप रहने का नहीं है; देश को अनैतिकता में ढकेलने वालो और उनकी नीतियों के ख़िलाफ़ अब तो बोलना ही है।

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